प्रावकृथन

प्रस्तुत निवन्ध मूल तो जर्मन विद्वान ओ० लोयमानका लिख हुआ है इतिहासश शिरोमणि, गुजर पुरातत्व मन्दिर्के आचा- थे पूज्य वन्धु श्रीयुत जिनविजयजी महाराजने लगभग दशवषे पेस्तर इसे एक जमन भाषाके ज्ञाता विद्वानसे शुरजरगिरामे अनुवादित' कराकर प्रकाशित किया था। वह अनुवाद जितना सरल ओर सुन्दर होना चाहिये वैसा था या नहीं इस विपयमे मे कुछ नहीं कह सकता परन्तु तद्गत भावसे प्रेरित हो हिन्दी भाषी विद्वानों के लाभाथ मैंने इसे हिन्दीमे लिख दिया है। इससे विचारकु विद्वानों की चुद्धिको खुराक अवश्य मिलेगी, क्योंकि यह एक निष्पक्ष जैनेतर गवेपक एवं विचारककी प्रोढ लेखिनीसे लिखा हुआ ऐतिहासिक निबन्ध है।

इसमें बुद्धदेव ओर भगवान्‌ महावीरकी जीवन चर्या और उसके सिद्धान्तों पर तुलनात्मक दृष्टिसे प्रकाश डाला है तथा कुछ समानताये भी दिखलाई हैं

अन्तमें में कलकत्ता निवासी श्रीयुत वाबू भेरूँदानजी फोठारी,

तथा मद्रास निवासी श्रीयुत चावू लालचन्दजी ढढ्ढा इसके सहायकोंको धन्यवाद देता हूँ।

तिलक विजय देहली फाल्गुन पूर्णिमा

भारतका ग्राचीन कॉल

प्रथम हम बुद्ध धमकी स्थापना तकके प्राचीन भार-

- तीय धर्म त्रिकास पर इष्टिपात करते हैं | इस विकांसकों लगभग ई० स्‌० पू० 2२०० से ई० स० पू० ४००

'जितनी शताब्दियाँ समी थी | यहं युग आयीके विजय और विस्तारका था | हमारी इंडोजमेन प्रजा पश्चिमसे मिक्रतकर सिधु नदीके किनारे पर आये बाद धारे धीरे व्मगानदीकी समतल भूमियर आई | वहाँस दक्षिण एवं उत्तरमं हिमतालयकी ऊंची खांणोंम विस्तृत हुई।इस प्रकार इन शताब्दियोंम धीरे धीरे इस महाद्वीप कल्पका

अधिक प्रिमाग इंडोजमंन सांस्थानिकोंस भर गया वहाँ

पर बसते हुए आदि वासियोंके ये आये स्वामी वन बेंठे |

इसमें शुक्र नहीं कि स्वामी बननेकी इनमें योग्यशक्ति थी,

क्योंकि ये अपने साथही संस्कृति-उत्कप ले कर आये

'थे | इसके बाद सबसे पहिले संस्थान स्थापनकी महत्‌ क्रिया शुरू हुई | इंडोजमेन प्रजाके प्रमाणमें अनेक टोले

असंख्य आदिवासियोंम संमिलित दाने लगे | गौरवरण प्रजा

श्यामबर्ण प्रजामें संमिश्रित हुई और इससे बड़े बड़े राज्यों

बुद्ध और महावीर ( + )

सन्‍सन सी जन-> अमन 2 न्‍जी. न्‍ीज-. रची. >सीससीसजसीन नमी दा

की स्थापना हुई। श्यामवण प्रजाफे जो लोग वहाँसे इधर उधर खिसके थे उन सबको गौरवरण ग्रजाका दास त्व स्वीकारना पडा | इस विजयका ओर संस्थान स्था- पनाका प्राचीन काय इसके पश्चात्‌ के नवीन युगम पुनः नवीन रूपमें ग्रारम्म हुआ पूवकालकी इंडोजमंन प्रजा धीरे धीरे पूनर कालीन आदिवासियोंमें मिल जानेपर कुछ शक्तिसंपन्न अजा वनी थी | इसके वाद दूसरी ढफ़ा' इन्डोजमन प्रजाके एक अंशने फिरसे मारतपर अपना अधिकार जमाया। जिस प्रकार आधुनिक राज्यकर्ता भारतवापियोंसे भिन्नही रहते हँ इसी प्रकार इस दूसरी दफाकी संस्थान स्थापनामें भी वना | गौखण श्रजाको श्यामवरण प्रजासे दूर रहनेकी आवश्यकता जान पडी। क्योंकि मिश्रण होनेसे उन्हें अवनतिका अनुभव हुआ था, तथापि यह अय्ननति तीन श॒ताब्दियांके अन्तमें स्वाभाविक ही होगई थी। प्रारम्भमें तो गौरवर्ण प्रजाने इससे बचने का प्रयत्न किया था, परन्तु इस वणशंकरता और अब- नतिके सामने उपस्थित किये विग्रहके रक्तण स्वरूपमें जा: भेदकी स्थापना हुई यद्यपि इस तरह भारतीय जाए * भेद प्राचीन भारतके संस्कृति विकासका - ,च<4 अग था, परन्तु इस जातिभेदने उस परिणाममें इनके शिद्वान्तका रूप धारण कर लिया। वेदमेंसे पीछेक्े यु

ू. अजीज 2. #०+

( ) भारत का प्राचीन काल विकासको प्राप्त हुये इनके धर्मेस्वरूपका एक से बन शया और उसी धमस्वरूपकी आज हम त्राह्मरपर्मके नाम

से पहचानने हैं

नेवेद्य-समपंख-बलिदान यह इस धर्मका दूसरा मेरू चना | यह नेवेद्य कम यद्यपि अम्रक स्वरूपमें स्वाभाविक नया पृत्रकातमें मी था, परन्तु वेढके पिछले थुगमें इसने स्पष्ट और संपूर्ा रूपधारण क्लिया | आबोके प्रवास छाल मे ऊचे च्ठी हुई काव्यध्दनि धीरे धीरे लुप्त होती गई और कुछ गृद कन्पनायें एत्रं कुछ व्यवम्थित नि ये धर्मपर अपना प्रभाव डालते गये त्योत्योंही यह समपेस चलिदान पुगेह्वित संप्रदयक्े बलसे वर क्रियामें प्रधान क्रियाका स्थान प्राप्प ऋगता गया

प्राचीन वेंदिक धर्मेमें जो काव्यध्वनि मुख्य थी वह अपना स्थान कायम रख सकी | ऐसा क्‍यों हुआ अक्वतिका स्पप्द और ब्वनित भव तथा पृज्ा मिट्कर इस प्रकार गृ गी अक्ृति भावना क्रिससे श्रगट हुई ? अनेके अबर बादमें एकेश्वर बादका जन्म किसलिये हुआ

इस विकासमें जिस प्रकार बह आगेकी दिशाका यूदचिन्द्र था उसी अकार पीछेक्ी दिशाका पदचिन्ह भी इसमें समाया था | विश्वममस्तकी-विश्वेक््यकी भाव- ना प्रगटी इसीलिए यह आगेकी दिशाक्रा पदचिन्ह था

चुद्धओर महावीर ( )

निनननज जज

और प्राचीन देव स्वरूपकी भावना लुप्त होकर उसपर की आस्था नष्ट हो गई इतने अंशमें यह पीछेकी दिशा का पदचिन्ह था। विश्वसमस्तकी भावनाने जन्म धारण किया | आधार भृत नीवके स्वरूपमें आत्म और जहान के विकासकी रचना हुई ओर वह पूज्य भावना से नीवमें चिनी गई। अब ग्राचीन कालका भव्य देव स्वरूप मात्र अधदेव स्वरूप-अपार्थिव व्यक्ति स्वरुपको आप्त हुआ और व्यवहार अदेशोंमें से निकलकर उसने ऋलपना ग्रदेशोंमें ग्रवेश किया |

इससे मानव स्पभावको नवीन खाद्य देनेवाली कुछ चस्तु- के लिये धर्मके नये स्वरूपकी भूमिका केसी रची गई यह वात भल्ी अकार समझी गई होगी इसी ग्रकार रोमनमें भी प्राचीन युगमें परिवतन हुआ था, क्योंकि चहॉँपर समय व्यतीत होनेपर प्राचीन मान्यतावाली देव भावना बन्द होगई थी और वहाँ के दर्शन शास्त्रोंने विश्व सम- स्तमें एवं इसके सब अ्रकारके स्वरूपमें आत्माका आरो पण किया था। समुद्रों और प्तों के द्वारा बाकीके देशें, से जुदे पड़े हुये प्राचीन भारत वासियोंकी अपेक्षा विवित्र ही प्रकारसे पीछेके पांच सौ वर्षामें भूमध्य समुद्रके चारों ओरकी ग्रजाओंके सम्बन्धमें आनेसे वहॉपर विकाश , हुआ | जुदे पड़े हुए उष्ण अदेशकी अपेन्षा तीसरे खण्ड:

बन अली सी रभमभक जन, _>५०३५+रीजीजी, अमजीरीडी सीडी जर-ग सजी जीमी+-सरीसस्‍ीऊ<4 42 रीनी सनी बजगर जज नर नम >क बज

( ) भारतका प्राचीन काल

जज १४ ++>०> * >> जन कर मजा मनरथन -+ नि आज चऋ अी जाओ ही नी माजज >ी रजत ०>>०क

के समशीतोप्ण पदेशोर्में मानव स्वभावका नवीन फल अमाणमे विलम्बसे और विचित्र प्रकारसे लगा इस बात में तो कुछ शंका ही नहीं कि यह बविलम्बसे लगा हुआ फल स्व्राठिप्ट और स्वास्थ्य वर्थक निकला। प्राचीन कालमे जदी पड़ी हुई संस्क्ृृतिसे भिन्न ही ग्रकारसे नया स्वरूप विस्तारकों प्राप्त होता हआ आज भी अपना काये किये जा रहा हैं | शत्र हमें चणभर ठहरकर यह जान लेना चाहिये कि इणए्डोजमन जानिका अमुक भाग प्राचीन कालमें समशी तोप्ण प्रदेशोमेस गम्ता करता हुआ उप्ण प्रदेशमें आया ओर उसमे भी श्याम प्रजाके चीचमें जा बसा | उस समय चहॉपर इसकी धर्म भावनाका विकास क्रिस प्रकार हुआ! बुद्ध और महावीरके नूतन धर्मेस्वरूप इसी प्रकारके मानव ' स्व्रभावका फल हैं | एमा मालम होता हैं कि इस विशि प्ट बस्तु स्थितिम हमारे फलके अन्दर अमुक विशिष्ट ग्कार _ केस्थाद, अमक परदेशी भूमिके स्वादने प्रवेश किया। यह स्वाद अमक विशिष्ट प्रकारका अद्भुत मत है | यह मत कमसे कम बाद्ध धमंसे हजारों वष पहिले भारतमें अचलित था और बुद्धूके समय इसने लोक प्रचलित ' अममं प्रवेश किया था | यह मत पुनजेन्मका मत हैं | ' हम लोग तो पश्चिमकी संस्क्ृतिके विकासमें जन्मे हैं।

बुद्द ओर माहावीर ( 5 )

अन्‍ननीनीनी, लीसीगीजानन्‍ी पी जीती

इसलिये हमे यह मत व्रिलकुल अलोकिक मालूम दे इसमें कुछ आश्चय नहीं, परन्तु बुद्ध और उनके समयके लोगों को यह केवल स्वाभाविक मालूम हुआ था, एवं आज कलके हिन्दुओंकी भी वह स्वाभाविक ही मालूम देता है इस मतकी जड़ खोजनेके लिये हमे भाग्तके उन आदि चासिन्दोंके दरवाजे पर पहुंचना चाहिये जिन्हें इण्डोजमन प्रवासियोंने जीत लिया था ओर अपने धर्म में मिला लिया था प्राचीन वेटकालम तो हमारी इण्डो जमेन प्रजामें पुनजेन्मके मतका कोई नामोनिशान तक भी था, तथापि प्राचीन ग्रीक मृत्यु बाठके जीवनकों ओर इसी तरहकी पारलोकिक बातोंकी मानते थे वेद कालके वाद कितनेएक वर्ष व्यतीत होने पर तो यह मत भारतमें स्ेत्र पसर गया इस प्रकार यह आदि वासि योंका मत था, वहॉकी भ्रमिका आस्वाद्र इस फलमें अवतीण हुआ था |

अब यह देखना चाहिये कि पुन्जेन्म के मत मे क्या भाव रहा हुआ हैं? बहुत से विचारक विद्वान कहते हैं कि इस प्रकार सिद्ध हुए धर्म के स्वरुपमें उसके दो भाव हैं। एक तो यह कि सृत्युकेबाद यही जीवन कायम नहीं रहता, परन्तु किसी दसरे स्वरूपमें रहता और मरनेवाले की आत्मा किसी अन्य

( ) भारतका प्राचीन काझ

योनिम मनुप्य या क्रिमी इतर ग्राणीकी योनिमें अबत रती है इस मतका दूसरा भाव ऐसा है और वह विशेष महत्वका भी है, धार्मिक विचारक इसे अधिक महत्व देने हैं | पुनजन्म के मतानचुसार आजका जीवन पुणय फल या पाप फल पायगा, अथात पृण्य जीव सृत्युके बाद अच्छी गति श्र प्ट जन्म पायेंगे और पापी जीव किसी खराब जन्मकों आप्त करेंगे। इस प्रकार पुनजन्मके आधार पर विश्व व्यवस्थाकी नेतिक योजना रची जाती हे मिद्धान्त इस तरहका है कि पुएय जीवों एवं पायी जीवॉकी उनके कर्मका फल इस जन्ममे पूर्ण रीतिसे मिल नहीं सकता, इससे एसा ही अनुमान करना पडता हें कि आज तकके जीवनका अनुसंधान करनेवाला दूसरा नवीन जीवन होना चाहिये। इस समस्त मतके परिणाम जीवनकी वर्तमान स्थितिका कारण भी स्पष्ट हो जाता हैं | जीवने गत अबताग्म जो पुण्य कर्म किये हों उनपर ही उसके इस जन्‍्मके श्र प्ठ फलों का आधार हैँ और उसी प्रकार इस जन्मके खराब फल उसके गत जन्‍्मके पाप कमके लिये हैं | हम मतके अनुसार अनेक जन्म होते है ओर इसके परग्णिमम वर्तमान जन्मका कारण केसा कल्पित किया जाता है, इसका हास्य जनक एक उदाहरण देता हैँ | जब कोई अंग्रेज अपने कुत्त को गाडीमें बेठाता

बुद्ध और नहाचीर ( )

हे तव एक चतुर हिन्दू आशय पाता है ग्ीर कहता है कि इस छुत्तेने इसके पूर्व जन्मे पुएय कमे किया हुआ होना चाहिये” जिसके परिणामर्मे यह इस जन्ममें गाड़ीमे बैठने का सुख पाता हैं। तथा पूर्व जन्मको अजुसरने चाला स्मरण भी होता है। जिसे पूर्व जन्मके मतमे संपूर्ण श्रद्धा है उसमें दिव्य शक्ति प्रगट होती है, उसकी कल्पना और वस्तु स्थितिके बीचक्ी सीमा मिट जाती हैं एवं इससे उसे पू्न जन्मके स्मरणकी स्फुरना हो आती है | इस अकारके दिव्य स्मरण द्वारा अपनी वर्तमान स्थितिको चहुत अच्छी तरह समझ सकता है और ऐसी समझ होने से वर्तमान स्थितिमें संतोप मानता हैं ।चुद्ध और महा चीरके समय यदि कोई अपने एक या अनेक पूर्व जन्मोंका स्मरण कर सकता तो वह घन्य गिना जाता था | इस अकार पुनजन्मका मत परलोकके साथ सम्बन्ध रखनेवाला नतिक धार्मिक मत हैँ। प्रथम तो यह आत्माको अमरताका ग्रतिपादन करता है क्‍्यों'क सृत्यु से कोई जीवनका अन्त नहीं होता। इससे अतिरिक्त जगतकी नेतिक व्यवस्थाका भी अतिपादन करता हे, क्योंकि जीवका ग्रारूघ उसके किये हुवे कर्म पर आधार रखता है, ऐसा जानने परभी सचमुच ही यह मत हमे अदूश्रुत और विचित्र लगता है इस मतके अनुसार लाख

( ) भारतका प्राचीन काल

कि] ला इन लय

चौरासी में फिरते हुए मनुप्यको पशुमें भी जन्म लेना पड़े परन्तु हमारी भौतिक विद्याके मतानुसार तो गृथ्वी परका ग्राणीजगत सबसे नीचेसे शुरू हुआ था और पशु ऐवं मनुष्यके बीच कुछ भी तात्विक भेद नहीं। हम इस दूरके एवं अन्तिम आधार रूप परलोकको नहीं मान सकते, ओर इसीसे हमने इस लोककी महत्व दिया हैं। तथा उच्च एवं स्व॒तन्त्र भावनाको वस्तु स्थितिके संकुचित कोनेमें दव्रादी हे हमे यह सुन्दर और भव्य लगता होगा परन्तु यह मात्र पोल और संकुचित चष्टि है चुद्धेफे पृकालीन भारतके धार्मिक इतिहासकी खोज करते हुये हम उस समयके विशिष्ट प्रकारके धर्म सतके-पूचे जन्म सतके द्वार पर पहुंचे है। वहाँ पर नई जीवन चयाके विशिष्ट आश्रमकी पहचान होती है इसका विधि ऐसा है कि उत्तर अबस्थामें मनुप्यको संसा रसे अपना जीवन समेट कर वनमे वास करना चाहिए तथा इस ग्रकारका विधि भी है कि बृद्धावस्थामें उसे घर व्यब्रहार अपने पूत्रोंकी सौप देना चाहिये और उसे स्वयं जंगलोंम चले जाना चाहिये, गृहस्थ जीवनकी उत्तरावस्थाका जो आश्रम हैं उसका नाम बानग्रस्थ (वनमें जा रहना ) है | इस आश्रममें रह कर मनुप्य जिस आध्यात्मिक साहि

र+->जरमीनाजत # मनन > सी - अर 223 जन

बुद्ब और महाबीर ( १० )

वकमतकनी आफ जी जी जीजन नीच. जज

त्यका अभ्यास करता है उसे आरणएयक बनग्रन्ध कहते हैं। उस समय सुव्यवस्थित रीतिसे स्थापन किये मठसमे या विहारमें रहकर भी जिज्ञासु अभ्यास करते थ। भारतीय साधु संघ विकास होने पर इन मठ और पविहा- रोकी स्थापना हुई थी और यह स्थापना चुद्धके थीडह्ा

समय पहिलेसे शुरू होने लगी थी। बनमे जाकर एका- न्तमें रहनेके बदले वयोद्द्ध पुरुष किसी प्रसिद्ध मठम जा रहते और फिर वे धीरे धीरे उस मठके गुरु एवं अधि- प्ठाता बनजाते थे। इस प्रकारका उल्लेब हैं कि वृद्ध जिस वक्त उपदेश करनेके | लिए विचर उस समय अनेक मठा- घिप्ठाता अपने शिप्य समुदाय सहित चुद्धकी शरणमे गये ओर उन्हें अपने साधुसंघकी रचना करनेमें सड़ा- यक बने अब यह तो भत्ती प्रकार मालूम होगया कि भारतमें प्राचीन मठोंमें से विकासकी प्राप्त हो कर साधु- संघकी रचना किस प्रकार हुई | परन्तु इन मठोंका भी विशिष्ठ इतिहास मौजूद है | पाठक महाशयकी मालूम ही होगा कि दोईचलान्तके ( जिसे इ'ग्लिश में जम॑नि कहते हैं ) अनेक प्रान्तोंमें इस प्रकारकी प्रणाली हैं गृह- पति जब उत्तरावस्थाको प्राप्त होता हैं तब वह अपना घर बार पृत्रको सॉपकर संसोरसे किनारा कर जाता है | भारत वासी जिसे वानग्रस्थ-बनमें जा रहना कहते हैं सो

( ११ ) भारत का प्राचीन काल

हे. कननरनम>-- अपजी-ग) जज फी अपन्‍नन-

यह अचस्था कही जा सकती है | हमारे यहाँ तो यह मात्र सांसारिक रूढी रिवाजकी प्रथा है परन्तु भाग्तमें सव वस्तुओंपर धार्मिक रंग चढता हैं, इसलिये उस रूद़ीने धर्म प्रदेशमें प्रवेश किया है इसे धार्मिक विधि टिया गया और व्यवस्थाके द्वारा पूणं विकास देनेका प्रयत्न किया गया हैं इस तरह जो रुढी प्राचीन इन्डो जमन ग्रजामें थी वह भारतमें जाकर धार्मिक विकासको प्राप्त हुई उसमेंसे वानप्रस्थ आश्रम विकस्व॒र हुआ ओर उसीमेंसे मठ नियत हुये

सांसाग्कि धार्मिकताके साथ ही साथ जो ग्राचीन विकास हुआ उसके परिणामसे भारतमें पूर्वोक्त प्रकार से साधु जीवनकी योजना हुई और उसे अत्यन्त महत्व ठिया गया | इस विकाससे बुद्ध और महावीरके धम्मके साथ ख्त्रिस्ती धर्मझी भावनामें महत्वका विरोधभाव विकसित हुआ ।पूर्वका भारतीय धर्म संसारमेसे पलायन कर जाने बृद्धावस्था, त्याग, संक्षेप संन्यस्त सम्बन्धी है, और पश्चिमका धर्म संसारकार्य युवावस्था, पुरुषाथ आशा तथा संचिप्तमें मन्दिर सम्बन्धी हे | बुद्ध और महाबीरके धर्म मठ अथवा हमारे मठसे मिलता हुवा कुछ मध्यविन्दु हैं| खिस्ती धममके मध्यविन्दुर्मे मन्दिर है

अभी तककी च्चासे हम थोड़ा बहुत यह

अनन्‍ननजानन फरी+न्‍क सम

बुद्ठओर महावीर ( १२ )

| इ]

जान सकते हैं कि महाबीर और बुद्धका धर्म कौनसी भृमिकामें से स्फुरित हुआ था | इनके पिछले अन्तर पटमे प्राकृतिक शक्तियों की इन्डोजमेन वेदिक मावनाकी पूजा है अर्थात्‌ काव्यमय अनेकेश्वर वाद है इसमेंसे भीत्तकी ओर एकता साधन करनेके उपाय किये जाते हैं। और अद्ठ बादकी दिशाओंकी खोज की जाती हैं | बाहरकी तरफ इससे विपरीत बलि पूजाका जोर बढ़ता हे और साथही समाजमें बरणविभाग की योजना भी की जाती है। धीरे धीरे विकास होते हुये पुनजन्मका मत प्रगट होता है और प्राचीन अभ्यास के वल्से आश्रम, संस्थायें' तथा साधु जीवन विकास प्राप्त करते हैं इसके साथही समस्त देशोंमें चंचलता अवेश करती है | नये आदर्शों की कल्पना की जाती है सब दिशाओंमें दृष्टि पड़ती है और परिणाममें नये आद शॉ की योजना की जाती है |

क्राइस्टके पूवे छठे सेकेमें नये नये मतोंका जन्म होता है। प्रोहित संस्थासे और उसके बलिघर्मसे उक्ताये हुये अनेक विचारक मनुष्य उनके सामने विरोधी 'युकार करते हैं और इस प्रकारका धर्म सिखानेका प्रयत्न करते हैं कि जिससे एक दूसरेके विरुद्ध चलते हुए अनेक मतोंका एक संग्रदायमें समावेश किया जाय, तथा जिस

( १३ ) भारत का प्राचीन काल

फीजी नम रकम 2०. जन जा->)०जीज बाजी जत 2: अभी सजी जी ९. 3७:०4 4०५ ७-2 >पकमाामन,

से धार्मिक क्रियाओंकी किसी जुदीही नयी भूमिकापर स्थापन किया जा सके | इस प्रकारके अनेक विचारकों के ( महाचीरका जमाई जमाली, गोशालक, तिस्सगमुप्त, कालाभ, उद्रक आदि-अनुवादक ) नाम हम जानतेही हैं | परन्तु इनमेंसे दो ही व्यक्तियोंका नाम प्राचीन कालके इस अन्धकारमें पूर्ण रीतिसे श्रकाशित होता है। मात्र ये दो व्यक्तियां ही इस प्रकारके धर्म संघकी स्थापना कर सकी कि जो आज परययन्‍त अखण्ड प्रवाहइसे चला आता हें जिसमें इनके विचार और आचार ग्रवल रुपसे काये कर रहे है और जिसमें कई शताब्दियोंके व्यतीत हाते हुये भी गद्य एवं पद्य रूपमे हजारों साहित्य ग्रथोंकी रचना होती रही हूं ये टो पुरुष अपने स्थापन किये और आज तक जीवित रहे हुये संघ से और संघके द्वारा निर्माण हुये साहित्यसे हम प्र स्पष्ट रूपसे प्रकाश डाल रहे ह, और दूर द्रके अन्धकार में झयके समान अ्रकाश कर रहे हैं। इन्हींके समय धार्मिक आन्दोलन करनेवाले दूसरे विचारकोंको आज हम परोत्न रूपमे ही जानते हैं | अथांत्‌ वे मात्र ग्रह रूप से ही प्रकाश करते हैं ,

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नाम निर्देश

ये दो मुख्य आत्मायें कौन थीं ? ये दो धम संस्था- यक कौन थे ? ये दोनों पूज्य नामोंसे पहचाने जाते हैं | पहले महापुरुषका जन्म ६० स० पू० ४७० के अरसे मे हुआ था और ये महावीर याने बड़े विजेताके नामसे पहचाने जाते हैं | दूसरे महान्‌ पुरुषक्रा जन्म ई० स॒० पू० ५५०के अरसेम हुआ था। और थे वृद्ध-बानीके नामसे पहचाने जाते है इसी प्रकारके इनके दूसरे नाम भी है। इन दोनोको अन्त (पूज्य भगवन्त ( ग्रश्ु) अथवा जिन (जीतने वाले ) भी कहते हैं| इसके सित्रो महा- चीरकी वोधइर और बुद्धकी तथागत संज्ञा भी बहुतही लोक प्रिय और प्रचलित है तार्थड्ू रका शब्दा्थ तार नहार- तारनेवाला, अथांद मुक्तिमागपर चढाने चाला होता है और भावाथ मार्ग दशक होता हैँ तथा गतका शब्दाथ ऐसे गय। यान सच मार्गपरचढा ऐसा होता है और इससे इसका भावाथे आईर्श रूप अथवा आउशे- भूत होता हैं इन सब नामोंकोीं विशेषतः इन दोनों महान थुरुपोंक पूजत और शिष्य हमेशा उपयोगमें लेते हैं

( १४ ) भारत का प्राचीन काल

34 40662 0644 % ७४४34 के 2३७७. रच री कक थजपवपयकलकमपकनओ.. रीडर, ५७०

जिस जातिमें इनका जन्म हुआ था किसी समय ये उस जातिके नामसे भी पहचाने जाते हैं और उन नामोंमें इनके उत्तम कुलमें जन्म पानेकी भावना भरी हे | महा चीर ज्ञात कुलमें और बुद्ध शाक्‍्य कुलमें जन्मे थे, इस कारण महात्रीरको ज्ञातपुत्र और बुद्धको शाक्‍्य पुत्र भी कहते हैं | इसके बाद इस दूसरी संज्ञा शाक्‍्य पुत्रपरसे चुड्धको शाक्य मुनि (शाक्य विचारक ) अ्रथांत्‌ शाक्यकुल में जन्म पानेवाला ज्ञानी पुरुष ऐसामी कहते हें। बुद्ध संज्ञाके उपरान्त यह संज्ञा बहुत प्रचलित हो गई है और हमारे धर्म संस्थापकोंम यह व्यक्ति इस नामसे विशेष ग्रस्यात है | इन व्यक्तियोंको इनके घरमें इनके माता पिता, बहन, भाई, सगे सम्बन्धी मित्रजन किस नामसे बुलाते थे यह जानना भी आवश्यक हे | महाबीरका नाम चधभान (बढ़ता हुआं) था और बुद्धका नाम मिद्धा् (भाग्यशाली ) था जब हम संज्ञाओके विपयमें विचार करने वंठे हैं तो फिर हमे यहभी निश्चित करना चाहिये कि महावीर और बुद्ध के अचुयाई किस नामसे पहचाने जाते ओर पहचाने जाते हैं| लाटिन सख्रिस्तुस ऊपरसे पलिसस आनुत फ्रच्व (०४:०७७) और जमंन खिस्त तथा मोहम्मद परसे जिस प्रकार यूरोपमें हमने माहम्मद 'नर शब्द कायम किये हैं उसी प्रकार चुद्धपससे उनके

नाम निदेश ( १६ )

जी. #जी अपर शार- गतधिलजपिटअओ अजीज नमी अत +ज लक

अनुयायियोंके लिये चुद्धिस्ट शब्दकी योजना की गईं हे | खुद हिन्दुस्तान में ब्राह्मण धर्म बुद्धके अनुयायियों को वीद् कहता है और महात्रीरके यनुवाय्रियोके उपनाम लिन ऊपरसे जेन कहते हैं, जिन्हे हम जिनिम्द कह सकने हैँ। महावीरके अन्ुयायीके लिये हिन्दुस्थानमें उपयुक्त किया जाता जैन एवं यूरोपमें बने हुये वुद्धिस्ट शब्दके अनुसार जिनिस्ट इन दोनों पारिभाषिक शब्दोंका हम वतमानकाल में उपयुक्त करते हैं। और इसी प्रकार महावीरके धर्म सम्बन्धमें जब बोलते हैँ तथ भी हम जैनधर्म एवं (जमन) जिनिस्मुम इन दो पारिभापिक शब्दों का प्रयोग करते हैं मेने जो यहॉपर इतने सारे नाम गिनाये हं इन्हें पढ़कर पाठक महाशय कहेंगे कि नाम तो राख और भ्रृत्र परन्तु इस वोतकी परीक्षा करनेसे स्पष्ट मालूम देगा कि अम्नुक प्रकारके नामोंमें कुछ कुछ महत्व अवश्य होता है | पूज्य और मागदशक जेसे उपनामोंम भी ' भाव तो हे ही, परन्तु यदि यथार्थ रीतिसे समझा जाय तो बुद्ध और महावीर इन दो मुरूय नामोंमें इनसे भी अधिक: भाव समाया हुआ हे बुद्ध अर्थात्‌ जिसने ज्ञान प्राप्त किया हैं उसे हम ज्ञानी कहते हैं। महावीर अर्थात्‌ सबसे बड़ा विजेता, यह

नाम निर्देश ( १७ )

०. #क तन जग, व्जजी

नाम हमें एक दूसरीही विशाक्री ओर खीचता है। साधुओंमं तो वीर वही है कि जो सबसे अधिक कष्ट सहन कर सके, जो तपश्चर्यामें बहुत आगे बढ़ सके इसलिये महाबीरका अथ लगभग महान्‌ तपस्त्री भी हो सकता है प्राचीन भारतमें तपसके सम्बन्धमें विचार करते समय पीरस्थान के सम्बन्धमेंमी ,अवश्य विचार किया जाता था, और इसका अथे तपश्चर्या होता था। अर्थात्‌ दनमें निश्चल वेठना और अपने आप दीररूपमें पिद्ध होना तथा हवा पानीके एवं अन्य कष्टोंकी कुछ भी परवाह करना | स्वाभाविक रीत्या ही इसका हेतु यह था कि अपना चीरत्व जग जाहिर करना, परन्तु कष्टसे अपने शरीरकी दमन करना था | इसी कारण बुद्ध ये शानी और महावीर ये महातपस्वी थे और इससे इन दोनों महापुरुषोंके लक्षणम साधारणतः सचमुच ही बड़ा भारी अन्तर कलक आता है | महावीर अन्त तक सच्चा तपस्वरी है, और तपस्‌ ही उनके धर्मेका मूल एवं मख्य पाया हैं बुद्धने भी अपने साधु जीवन सम्बन्धी प्रारम्भके वर्षोमं इस विशामें प्रयत्न किया था। इन्होंने वर्ष पर्यन्त तपश्चर्या का आचरण किया था। परन्तु इन्हें यह ज्ञान हुआ कि जिस प्रकोर संसार भोग शक दिशाकी परिसीमा है उसी प्रकार तपस्‌ भी दूसरी

युद्ध और महावीर (४ £८5 )

0 #. अन्‍>

दिशाकी परिसीमा है | इन दोनों परिसीमाओंफकी छोड़

दिया जाय तो वीचके मागमे सुन्दर सत्य मिल जाय |

इस ज्ञानसे ही सिद्ध होता है कि इन दो पररुषोंमें बद्ध

आंधक घानवान और इससे यथार्थ रसैत्या ही इन्हें

ज्ञानी यह संन्ना प्राप्त हुई है, तथा उनने ही यथार्थ प्रकार

से इनके समकालीत पुरुष को महातप्वी यह संचा प्तहईह।

नमन ली>०-००

तपस॒ ओर सम्यक्‌

ऐतिहासिक मारगमें गमन करते हुये हमें प्रथम सपसके पम्पन्थम॑ विचार करना चाहिये। महावीर ने जीवन पयेन्त इस तपसका आचरण किया था ओर बुद्ध से अपने साधु जीवनके थोड़ेसे पहले वर्षों में उसको आचरण किया था| तपस शब्द में भारतवासियोंकी अति प्रिशाल भावना है | वे सब ग्रकारके उपवास और आत्म शासनका एवं काय क्लेशका समावेश इस तपसमे कर लेते हैं | इन्द्रियोंका दमन करना, स्वाभाविक लालसाओं एवं आत्म चापल्य पर विजय प्राप्त करना, आत्माको सहनशील बनाना, देहके तथा संसार सम्बन्धी ' बिल्ासों की बासनाओं और प्रलोभनोंकी इत्तियोंसे मुक्त होना चयह इस तपसक्रा आशय हे | भीतरका पुरुष (आत्मा) अपने उच्च प्रयोगोंसे पार उतरनेके लिये, इन्द्रियों शरीर सांसारिक जीवनके कारण उत्पन्न हुये अन्धनोंसें बल पूवंक अपना रक्षण करना इच्छता है। भारतवप में तपसके सम्बन्धवालें इन चे प्रयासीने शंनेक प्रकारके स्वरूप धारण किये हुवे हैं | तप अंग्ुर्क प्रकारका पुएय

बुद्ध ओर महावीर ( २० )

के -जसन+नजन 2५३१३ पकसनमनी जी... नन्‍रजीअरन्‍ी मरीज... 5

कम है, और यह अस्वाभाविक वल प्रदान करता है एवं परलोकमें शुभफल देता है | यदि मनुप्य स्त्र्य अपनी इच्छासे संयम और कष्ट उठाले तो उससे वह इस जन्म में पवित्रताकी छाया गप्त करता हैं और मृत्युके बाद ऊल्च प्रकारका सुख पाता है | यह भावना यद्रपि आज हमें नयी जेसी मालूम होगी यह वात सही है, तथाफि यह इंडोजमेन प्रजाकी प्राचीन कालमें बेंधी हुई अति प्राचीन धर्म भावनाके आधार पर घड़ी हुई है और इसकी रूप रेखाके चिन्ह प्राचीन जमन आचारोंमें उत्तरे हुए हैं। इण्डोजमन लोग मानते थे कि आध्यात्मिक पुएय स्वयं उठाये हुये कष्ट द्वारा या अन्य किसी ऐसे ही मार्ग द्वारा प्राप्त किया जा सकता हैं और खासकर दुःख पड़ने पर पापमुक्ति-पारलौकिक सहायताके आधारसे साने देवताओंकी सहायतासे प्राप्त की जा सकती है पृर्यके , लिये या पाप युक्तिके लिये लोग देवोंकी और नजर करते और उनकी तरफसे संकटसे रक्षण पानेकी। आशा रखते थे। संसारकी 'नेतिक व्यत्रस्थाके लिये देव्ोंकी प्राथना करते, क्योंकि वे उस व्यवस्था के रचक- प्लात़े ,जाते थे। देवोके अति आश्थनाको लोग'देवों: भर दैगअह- इस नामसे पहचानते और प्रतिज्ञाओं हा जप - आअरहकी सफल करते थे। अरतिज्ञायें इस प्रकोर

ही. 20०3५ जजीन जे अर मकम. आम सजी न्‍जरीमीजरी, और... 2०2 थी. सजी जज को -वानानबभकप...

( २१ ) तपस और सम्यक

>रज+>बतीीसपरीजननी सीसीजीन-नरीर मा जा... न्‍ीउ०> 2. अजर।

त्> जा मी आओ की आन

की जाती थीं ;में अग्रुक पुण्य ग्राप्त करनेकी प्रतिज्ञा लेता हैँ या पाप युक्त होनेकी ग्रतिज्ञा करता हूँ और उसमें देवोंकी सहायताकी आशा रखता हूँ दिवोंपर आग्रह” इस प्रकार के भावना पूण शब्द अभी तक भी ग्रीक भाषा में विद्यमान हैं। 0, ै४५४००१६००, 5९००१७ देवोंके समज्ष प्रतिज्ञा लेता हूँ? ( देवों को शपथ प्रतिज्ञा देता हूँ १) देवों पर आग्रह” के लिये इसी भावमें संस्कृत भाषामें तम्र॒ अमीतिअम ”? ग्रीकमें 0 » ये शब्द हे ग्रतिज्ञाको संस्कृतमें सत्यकार (ऐसा कऋरू गा) कहते हैं यहाँ पर इस स्पष्ट क़ी हुई श्रद्धा पर ही माने हुये देव निशेयका आधार था, और यह लोग मानते थे कि पाप मुक्तात्मा संकटसे मुक्त होती है। तथां जिसने इसे संकटठमें डाला हो वह मृत्युको प्राप्त होता है ऊपर से सहायता मिलती है और इस लिये ही पुएय, त्याग, याष, मुक्ति, पविन्रता आदि ग्राप्त हो सकते हैं इस श्रद्धा ने भारतमें इस प्रकारका स्वरूप पकड़ा कि अमुक अकारके तपसे ही ऊंचे कम बेंध सकते हैं | परन्तु इससे यह नहीं कहा जा सकता कि महावीर और बुद्धने प्रत्यक्ष तौर पुर इस भावना परसे अपनी भावना निर्मांण की। अल्कि जो मनुप्य तपसे प्राप्त होनेवाली इह लोक

चुद्धकर सहागूर. ( #*र )

ला 4 ८2७

सम्बन्धी कीतिके लिये री

तप करते थे उनका ये तिरस्कार करते थ्‌ | त्याग ओर कायक्लेश से इस लोकम या परलोकमे सुख ग्राप्त करना. अथवा इस लोकम कीर्ति आ्प्त करना उन्हों का यहआशय था, परन्तु मुक्ति प्राप्त करना ही उनका समुख्यआशय था | अब हम भारतके उस समयके घामिक दशशनकी एक नी मुक्ति या मोक्की भावनाके समीप पहुँचे हें जिसके सम्बन्धम महात्वीर और बुद्धने भी विचार किया था| इस भावनाके विषयम स्पष्ट रीत्या विचार करनेसे पहले हमे यह जान लेना चाहिये कि महावीर और बुद्धने तपके सम्बन्धम केसी कसी मावनायें वाँधी थीं। ये दोनो महापुरुप उत्तम कुलमे जन्मे ग्रे, दोनों अपने ही कुटुम्बम पालित पोषित होकर बड़े हुये थे और ढोनों लगभग तीस वर्ष के संसार व्यवहार से बिल्कुल उक्ता गये थे | इस तीस वर्पके सांसारिक व्य चहारसे ये इतने उक्ता गये थे कि अस्तमे उसका परित्वाग कर साधु चन गये और दोनों ने अतिआतुरता से एवं अपने परिपूरा पुरुषाथसे तपाचरण किया था।

परन्तु इनके लिये तप कसोटी पत्थर था महावीर इसमें पार उतग और इसके अनुसार उसने अपने घसकी योजना की. तपने ही उनकी मार्ग दर्शक भावना का

या परलोक सम्बन्धी सुखके लिये

( "४ ) तपस ओर सम्यक्

आन #+० ज्त जज जनम> .. -०

स्वरूप धारण कर लिया इससे विपरीत बुद्ध अनेक वर्षो की तपरश्चर्या के बाद इसके पार निकल गये ओर उन्हें इससे भी उच्च प्रकार की मार्गठशेक भावनाकी प्राप्ति हो गई | यह भावना ऐसी थी कि जिसकी भारतमें किसी को खबर थी, बुद्धने इसी भावनासे प्रेरित होकर इसी के अनुसार अपने घमंकी योजना की थी। उनका सत्र आधार मागंदशक पर अवलम्बित था | क्योंकि नेतिक और धार्मिक सिद्धान्तोंम तो महावीर ओर बुद्ध लगभग समान ही थे | मर्य विपयोंग उनका एक ही मत था, इतना ही नहीं वल्कि इनके समकालीन अन्य विचारकां के नेनिक और धार्मिक अभिम्नायों के साथ भी ये दोनों एक मत थे | उस समय के मख्य ब्राह्मण धमेके आचाये भी अपने नेतिक और धार्मिक मतों मे इनसे बहुत भिन्न थ्रे। वे मात्र जोति भेदकी संकुचितता ओर यज्ञमे पशओंको मारकर होम करनेके धार्मिक वन्धनोंमें बंध चुके थ्रे यह धम उन साधुओ को (महावीर और बुद्धका) बिल्कल पाप कमर मालूम हुआ, क्योंकि ये महान पुरुष फ्रिसी मनुप्य या पशुक्री हिंसाको सबसे अ्रप्ट प्रकारका पाप कम मानते थ। इस प्रकार इनका समस्त आधार मांगे दशक भावना पर था| अन्य संत भावनायें इस महत्वकी भाव

वह ओर सहनोर ( +४ )

जन

नाके नीचे क्षिस प्रकार सकती है रद यह देखना हो तो महावीरकी ओर दृष्टिपतव करना चाहिये तू हिंसा करना, आदि पाँच आज्ञाओम भी जो नीति धर्म नहीं समा सकता वह समस्त नीतिधम उन्होंने तपके केन्द्रविन्दु्में समावा हुआ दिखलाया है , आहार में, बस्त्रमें, एवं अन्य विपयोभें जो जो आज्ायें संयम पालनेकी त्राह्मण घर्मके मतसे तपकी विशाल भावना में आजाती हैं उन सबकी महावीरने बाह्य तपमें गणना की है और इसके उपगन्त ऐसी भावनायें, कितनी एक कठिन बातें और भी मिलाई है तमाम प्रकारके आचारों और त्रतों एवं वीरस्थांन जिसके विपयम ग्रथम कथन किया गया है इन सबके ढारा महावीर शरगीरक्ी कसने की आज्ञा करते हैं यह वात तो वे बिल्कुल नयी ही लाये हैं महावीरने इस न्‍्यूनाधिक व्राह्मयतपके स्वरूपों के समानही आन्तर तपके स्वरुपाकी भी योजना की है और इसमें विनय, सेवा आदि सर्वे साधारण आचारों एवं ध्यान वगेरह साधुओं सम्बन्धी विशेष आचारों का समावेश किया है | इसके उपरान्त जिसे ये लोग आत्म संयम कहते हें और जिसे हम स्वेधा आन्तर तपमें रखने को कहें उसे महावीरने वह्मतपमं दाखल किया है। णक प्रकोरसे तो हमें यह मालूम देगा कि तपमें चाद्य

( ) तपस ओर सम्यक्त

वीक०- बन्‍कतकत डक,

ओर आन्तर स्वरूपके बीचमें जो भेद किया हुआ हे वह

फोई सर्वेधा सच्चा भेद नहीं है, तथापि इस विपयकी टीका या चर्चा करनेकी अपेत्ता हम तपका संपूर्ण वर्गी करण करेंगे और अन्तिम निर्णय पाठकोंके ही हाथ मे सौंप देंगे। जेन ग्रन्थोंमें यह वर्गीकरण दो जगह

दिया हुआ है पहले उपाद़् में (3069 ते पच्य हुए0. 47 030 एपफ्तेल त०रू- पामच्छावव्त्रातेर5 १3]] 2, 79598,7 88-44)

आओर पोंचतव अर गम बाह्य एवं आन्तर तपक प्रतेककेद प्रकार है | वाद्य तपके छ8 प्रकार इस तरह ह---

2 मनशन अमुक समय तक ने खाना | अनोदरे कम खाना याने आहार वम्त्र वर्गरहमं आत्म

संयम तथा वाद्य अन्य व्रिपयोंग आत्म शासन श्राप्त करना भिन्नार्या-भित्ताके लिये जाना, याने भिक्ता द्वारा ही उदर निर्वाह करना स्सपरिस्याग-- स्वादपर संयम प्राप्त करना कोच्ज्लेश-.-शरीरकी कसना याने आसन लगाकर निश्चल भावसे ब्रेठडना, हलन-चलन शव थुकने आदिकी समस्त शारीग्कि क्रियापर संयम ग्राप्त करना और उसके द्वारा शरीरकों कसना

प्रतिस लीनना अपने भीतर ध्याद लगाना, याने समस्त बिचागें एवं ब्रत्तियोंकीं दत्रा कर एकान्त स्थानमें अमृक समय तक बेंठना | जिस प्रकार कछुवा अपने अंग को मिकोड लेता है उसी प्रकार मनुप्यको आत्मीय विचारों

बुद्ठओऔर महाबीर ( *5 ) ; मर में लीन होनेके लिये बाह्य संसारमें से अपने मनको समेट लेना चाहिये | है आन्तर तपके भेद इस ग्रकार हैं | श्रायश्चित्त श्रोष्ठ चननेफे विचार करना था अशुभकृत्यके लिये) पश्चात्ताप करना | विनय-दूसरोंका आदर करना। वैयाइत्य-- दुसरोंकी सेवा सुश्र्‌ पा करनेके लिये तेंयार रहना | सवाध्याय-विद्याध्ययन करना तान- आत्म चिन्तन करना। उत्सर्ग-संसार से आत्माकी समेट लेना, याने जन्मजरा मसृत्युकी परम्पराके कारणोंसे मृक्त होना। यद्यपि इस ग्रकारकी भावना सम्बन्धी समस्त मान स्िक प्रयत्न कुछ असार और कप्ट जनक मालम देंगे और इससे पाठकोंके मन पर कदाचित्‌ इस सारे वर्गीकरण से संतोप जनक असर भी हो तथापि महावीर श्रीर परोक्ष रीतिसे वुद्धफे व्यक्तिके विषयमें खास तोरपर ध्यान खिंचे ब्रिना रहेगा महावबीरको शोरीरिक और सांसारिक प्रलोभनोंसे मुक्त होना ह॑ और इससे अपने समस्त नेतिक एवं धार्मिक प्रयत्नोंको वे तपकी भावनाके नीचे ला रखते हैं बल्कि जो विनय और सठाचारका सब साधारण मानव घम्म है उसेभी वे आत्मसंयम, आत्म शासन और आत्म विजयमें समाविप्ट करते है | यदि संत्तेपमें कहें तो वे सब कुछ आत्मामें ही समा देते हैं

( २७ ) तपस ओर सम्यक

बन जज

बुद्धने जब धीरे धीरे यह देखा कि तप यह एक मिथ्या परिसीमा हैं तत्र उस छोड़ ठिया और महावीरके समान उन्होंने सब बातोंका तपमें समावेश किया। इस विपयमे जब उनका प्रिद्धान्त ही बदल गया था तब वे महावीरके समान तपकी उतना महत्व ढें यह उनके लिये स्वाभाविक बात थी | प्रायश्चित्त की आवश्यकता उन्हेनने भी मानी है और आत्म संयम एवं आत्म शास नकीोी सन्मान दिया हैं | परन्तु शरीरको कसनेव्राली, सब प्रकारके संयमचाली और कप्ट देनेवाली जिसे साधाग्ण रतिस लोग तप समझते थे और जिन्हें महा चीरने वाद्य तपमे दाखल किया हे मात्र उन क्रियाओं का याने वेसे आत्म व्रिजयका उन्होंने निरादर किया था किन्तु उनके प्रयत्नों द्वारा उन्हें इस प्रकारकी एक नई महाभावना-भूमिकाकी प्राप्ति हुई कि जो पूर्वोक्त बातोंस अधिक श्रेष्ठ और विशेष ढय्ग पूर्ण थी आर यही सच्चे महत्वकी वात है इसके लिये जो उन्हें। ने माग दशक शब्दका उपयोग फिया है वह तपस नहीं किन्तु सम्पक शब्द हैँ ओर इसका अथ यथाथ या शुभ होता हैं | समस्त विचार, समस्त उच्चार, समस्त आचार यथाथ अथवा शुभ होने चांहिये भाग्तमें समस्त विचारोंकी व्यवस्था पूवक संक

बुद्ध और माहावीर ( रे८ )

वजनी जीती:

लना करने वाला संप्रदाय हैं! उसी प्रकार बुद्ध भी अपने विचारोक्ते वर्गीकरणकी व्यवस्था की हैं उन्हेने आठ प्रकारके सम्यक वर्ग किये हैं परन्तु ये महावीर के बारह प्रकारके तपस बगेसे भिन्न प्रकारके है सम्यक्‌ के इस वर्गीकरण या इससे जो भाव समझा जीता हूँ उसे आये अष्टांगिक मार्ग कहते है! सो इस प्रकार हे- ? सम्यक दृष्टि-यथा्थ देखना या यथा आर्था।

सम्यक संकक्ष-यथाथे इच्छा या यथार्थ निश्चय |

सम्यक वाक-यथा्थ शब्द या यथाथ बचने सस्यक कम-यथाथ कम या यथाथ प्रन्नत्ति सम्यक आजीव,यथार्थ जीवन चर्या या यथाथे जीवन |

सम्यक प्रयत्त-यथाथ्थ प्रयत्न या यथाथ पुरुषाथ | सम्यक् स्मृति-यथा्थ स्मरण या यथा ज्ञान। सम्यक समाधि-यथार्थ ध्यान अथवा यथाथे

आत्म निमज्ञन |

उपरोक्त स्थितिका एक यह परिणाम हुआ कि महा

चीर एवं उनके शिष्योने तपकी जो महत्व दिया था वह बुद्ध और उनके शिप्येने कम कर दिया इससे जेनमुनि बौद्धसाधु जीवनकोी विज्ञास मय ओर सांसारिक कहने लगे यह अभिगम्राय और अश्लुभव भारतमें निश्चयरूपसे पसर गया और इसके परिणाममें चुद्धधमकी अपनी जन्म

नर बम, # लत डी जीन

जन

( २६ ) . तपस और सम्यक

भूमिमेंसे अदश्य होना पड़ा। परन्तु दूसरी ओर इसी जन्म भूमिने जेन धमकी आज तक टिका रक्खा और पालन पोषण किया हे | इसके पीछेके समयमें किसी जेन ,लेखक ने बोद्ध मिक्षओंकी दिन चयाके सम्बन्धमें निम्न उद्गार निकाले हैं मृह्ठी शय्या प्रातरुत्थाय पेयम्‌ , ,. भक्त सध्ये पानक चापरान्हे ठ्ानाखण्ड शकरा चाधरात्न , मोक्ष खान्ते शाक्‍्य पुत्रेण दृष्ट भावार्थ--कोमल शब्यामें सोना' सुच॒ह उठकर कुछ पीना, दुपहरकी भात और पिछले पहर कुछ पान करना आधीरातके समये द्रात ओर शकर खाना ओर इस प्रकार अन्तमें शाक्य पुत्रने मोक्ष देखा हे |

---9+-5८०-९ ६3 3 0८८६६२-+--

प्रत्येक बुद्ध ओर बुद्ध

'पूर्वोक्त प्रकारसे भगवान महावीरने समस्त पुरुषार्थ आत्मा परही बतलाया था महावीर मात्र साधुही थे बल्कि थे तपस्वीमी पूरे 'थरे | परन्तु बुद्धको सच्चा बोध प्राप्त हुए व्राद वे तपस्त्री रहे, किन्तु मात्र साधुद्दी रहे और उन्होंने अपना समस्त पुरुपा्थ जीवन घम पर ही कर बतलाया | इससे एकरुफ्रे उद शने आत्म धर्म और दूसरेके उद्द शने, लोकधमंका स्वरूप धारण किया चुद्धने अपने उद शकी आत्मधमंसेंसे विस्ठ॒त कर लोक «में प्रवेश कराया ओर इसी कारण यह अधिक अख्यात हे! अधिक पूजा जाता है ओर हमारी भावनासे इन दोनों महापुरुषों में चुद्धहीकार्रष्टक्ी दिशामें प्रयाण करते है हमे जो बड़ा भेद मालूम होता हे वह अन्य सदर विषयोंमें कलक आता है | इन सब विपयोग अब हम स्पष्टता करते जायेंगे | वुद्धकी दृष्टि जब समाजकी ओर झुकती है तत्र उन्हें स्पष्ट तौरपर यह मालूम होने लगा के मनुष्य केवल अपने एकलेके लिए ही नहीं परन्तु सम स्त समाजके लिये है | उसका आत्मदान दूसराक हितके

( ३१ ) प्रत्येक बुद्ध और बुद्ध

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लिये है” उसका आत्मभोग सबके हिताथे है | उनका यह धर्म महावीरके धसंसे सवेथा और स्पप्ट तौरपर यहाँ ही भिन्नत्व धारण करता हैं महावीरके धर्ममें सब्रसे उच्च आवबना आत्मत्यागक्की हे तथा दूसरी दो संज्ञाओंमे प्रत्येक चुद्ध ओर चुद्ध इन दो शब्दोमें स्पष्ट तौरपर बड़ा भेद मालूम होता है| प्रत्येक बुद्धका अथ अपने लिये ज्ञानी ऐसा होता है और बुद्धका अथ सबके लिये ज्ञानी ऐसा होता डे एक ज्ञानी मठमें ही रहता है और मात्र अपनी ही आत्मशुद्धिकी दरकारसे संतोप मानता है | दूसरा ज्ञानी लोक समाजमें विचरता हैँ और उपदेश एवं दृष्टान्तों द्वारा दूसरोंकी आत्मशुद्धिका प्रयत्न करता है | महावीर की मठवासी प्रत्येक चुद्धकी संज्ञा तो देही नहीं सकते' क्योंकि वे भी लोक समाजमें तो विचरते ही थे | वध्दके समान उनके भी अनेक शिष्य थे ओर उन्होंने भी सघस्था वन किया था, एवं वह संघ सदा विस्तारको गआ्राप्त होता रहा था | यद्यपि वह भारतकी सीमाके बाहर विस्तृत नहीं हुआ तथापि भारतमें तो चह आज तक जीपित रहा हैं अर्थात्‌ जिसे हम अत्येक बुद्ध कह सकते हैं उस वभमें तो महावीरको रख ही नहीं सकते। जो जल्लानी वास्तविक रीत्या अपनी ही आत्माके लिये जीता है” जो दसरोंको कुछ भी दितोपदेश दे' जो किसी को शिष्य बनादे

वन ७-2,

बजजरी अविजिजच्ड 2रीऔलसय्ण

बुद्ध और महावीर ( ह३े२ )

जो फोई संप्रदाय स्थापन करे! जो क्रिसी भी संप्रदाय में प्रवेश करे! जो संसारमें प्रचलित संग्रदायोंसे सीख कर नहीं परन्तु अपने अ्ुभवोंसे निर्णय पर आवे और जो मात्र तपसत्री जीवन व्यतीत करे उसे ही प्रत्येक बुद्ध कह सकते हैं| वेशक इस प्रकार महावीरको प्रत्येक बुद्ध से ऊँचा स्थान दे सकते हैं। थर्थात्‌ जिसवर्गेके मनुष्य अपनी आत्माके लिय्रे विशेष चिन्ता करते हैं ओर जिसके शिष्य इस तरह आत्मोद्धारके लिये ही पुरुषार्थ करते हैँ उस बर्गमें उन्हें रक्खा जा सकता है

इस प्रकार प्रत्येक्ष बुद्ध और चुद्ध इन दोनांके बोचका श्रशिपर महावीर थे। वे संकुचित वृत्तिवाले थे बुद्ध विशाल ग्रकृतिके थे। महा- वीर लोक समाजम मिलनेसे दर रूते थे और चुद्ध लोक समाजकी सेवा करते थे। यह भेद कितने एक अंश में इस बातसे स्पष्ट होता है कि उनके गृहस्थ शिष्य असंगो- पात जब कभी उन्हें भोजन करनेक लिये न्योता देते तब बुद्ध उनके घर-पर जाते थे | परन्तु महावीर तो यह जानते थे कि समाज जीवनके साथ साधुको - ऐसा सम्बन्ध घटित नहीं,। इसी तरह कितनेएक्र/अंशमें यह भेद इससेभी विशेष ध्यष्ट होता है कि चुद्ध विद्र करते समय दूसरोंके साथ बातचीत करते:थे और झर्थने, जीवन; विचारों एवं, जीवन

[६9 /) तएस आर सम्यक

'रीजीसीज> री ल्‍ जीजा #मीसीजी मन

आचारोंमें फेरफार होते हुये लोगोंको उपदेश दनेके और उन्हें ऊपर लानेके भावमें भी वे परिवर्तन कर लेते थे | अनुष्योंसे दर रहनेकी इत्तिके कारण तपरत्री महावीरने सब मनुष्योंके आत्मोद्धारके लिये ऐसा कुछ भी किया था | आध्यात्मिक उपदेश करनेके ओर शिक्षा देनेके लिए उन्होंने जान वूककर कभी किसी मनुष्यको बुलाया हो ऐसा मालूम नहीं होता वल्कि जब कोई मल्ुष्य अपने आप ही धार्मिक चर्चा करनेके लिए उनके पास आजाता तब वे कदाचित्‌ ही अपनी धार्मिक श्रेणी उसे समझाने की पर्वाह करते थे | परन्तु मात्र अपने मन्तव्य-कठिन 'सिद्धान्तके अनुसार उसे कठिन उत्तर देते थे

इन विषयोंमे चुद्ध किस प्रकारकी प्रणाली ग्रहण करते थे यह बात उनके साथ सम्बन्ध रखनेवाली अनेक कथाओं से स्पष्ट मालूम होती है| उनमेंसे एक कथा यहाँ पर दी जाती हैं इस कथाका नाम 'शुगाल शिक्षा” है। अर्थात्‌ इसमें शुगाल नामक एक मलजुष्यको दिए हुए उप देशका वरणणन आता हैं। वह मनुष्य गृहस्थाश्रमी था इस लिये हमारे रिवाजके अजुसार उसे मात्र शुगाल नहीं परन्तु भारतीय रिवाजके अनुसार शुगाल सेठ कहना चाहिये | यद्यपि इस नामके साथ यहाँपर कुछ सम्बन्ध नहीं है! मात्र इस सम्बन्धसे कुछ कहना चाहिए, क्योंकि

चुद्ध ओर महावीर ( ३४ )

च््न्न्लिड अजब जय जे जज ऊ+-न्‍र नर्स मी न्‍ी चली. ल्‍ीजपक करी. आजगीक-र 4४

कथाका नाम उसके नामसे सम्बन्ध रखता है हमारे इस गृहस्थाअमीका पालन पोपण ब्राह्मण आचार विचारम हुआ था उस धर्ममें प्रकृतिपूजा दूपरे स्वरूपमें इस अकार चली आती थी कि बहुत मलुप्य समस्त अ्क्ृतिकी पूजा करनेके बदले संक्षपर्मं मिन्न भिन्न दिशाओ की पूजा करते थे | कितनेएक लोग मात्र नमस्कार करते' कितने णक अग्ुक अग्मुक मंत्र उच्चारण करते ओर कितनेणएकऋ मनुष्य अम्क एक दिशामें कुछ जलांजलि देते थे इनमें से तीसरे प्रकारक मनुष्योंको जेन शास्त्रमे 'दिशापोखिय! कहा है। हमारा वह गृहस्थाश्रमी प्रथम बर्गका प्रकृति पूजक था। मस्तकके खुले हुये केशोंसे और जलाद वस्त्रों से ( जलादे वस्त्र शायद जलांजलिका चिन्ह हो ) हाथ जोड़कर प्रातःकालके समय चार दफा पूर्व की ओर” दक्षिण की ओर” पश्चिम दिशाकी तरफ और उत्तरकी ओर उसने नमस्कार किया'। इसके बाद अन्‍न्तमे उसी प्रकार चार दफा आकाशकी ओर और चार ही वक्त प।तालकी त्तरफ मस्तक झ्लुकाया | भारतवासी अतिप्राचीन कालसे साधारणतः छः अथवा दश दिशायें मानते है। हमारी चार या आठ दिशाओंमें आकाश और पाताल दिशा मिला लेनेसे पूरा होती है। हमारा वह प्रकृति पृ: एक समय अपनी आतःकाहीन पूजा कर रहा था। द्वीऊ उसीः

( ३४ ). तपस और सम्यक

न्केड बज

समय उसके घरके आगे चुद्धदेव पहुँचे | वे उसके पास गये, वह क्रिया किस लिये करता है इसका कारण पछा | उसने उत्तर द्विया मेरे पिताने मुझे ऐसा करना सिखलाया है भोर अपने पिताकी शित्ताको में स्वीकारता हैँ एवं पूज्य मानता हूँ इस लिये में यह क्रिया करता हैं बुद्ध मानते कि प्रक्रति पूजासे इस पकारके संस्कार चन्ध जाते हैं जिससे अन्तम मनुप्यका श्रशुभ होता है! इस लिए वे बोले-दिशाश की पूजा करनेकी अपेत्ता केवल भिन्न 'पकारकी छः भावनाओं के अनुसार आचरण करनेसे मानव जन्मकी सफलता होती हे | वे श्र पकारकी छ+ भावनायें इस तरह ह-पृ्थ दिशाम मा बापकी स्थापना करना' गुरु आर आचायका दक्षिण दिशाम स्थापना करना पुत्र म्त्रीकी स्थापना पश्चिम दिशामें करना मित्र सम्बन्धियोंकोी उत्तर दिशामें रखना' ब्राह्मण श्रमणो की याने पत्रित्र पुरुपोंकी स्थापना ऊध्य दिशाममें करना ओर दास जनोंकी स्थापना अभो दिशामें करना | इस अकार बुद्धदेव गस्ते चलते मिले ६ए भ्रहस्थाश्रमीकी आचीन-एच जोंकी प्रकृति पूजामें-आवबडद्ध श्रृहस्थाश्र्मीकी आजनामें उतग्ना जानते थे, अपनी मानव धर्मकी भावना उसे ममककाना जानते थे, इतना दी नहीं किन्तु हमारी इस कथामें थ्रागे लिखे म्रुजन इन भावनाओं का पारिपृर्णकर

चुद्ध ओर माहाबीर ( 35 )

३५ मर पक ध2 मिस न्‍,. रफेतीस्‍गेज जल बा मम मे के के पक

उपमें से कतेव्य शित्ता योजित करके परस्परके क्तेव्यमें जोडनेके लिये भी उन्होंने इस पार नये विचार बढ़ाये सन्‍्तानोंकी ही अपने माता पिताकी सेवा करता हैं इतना

ही नहीं बल्कि माता पिताकी भी अपनी सन्तानांकी सेवा करनी चाहिये। शिष्योंको ही अपने